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मध्यप्रदेश

बुरहानपुर में ‘वेस्ट से बेस्ट’ की अनूठी मिसाल, केले के तनों से महिलाओं ने बनाईं ईको-फ्रेंडली राखियां

बुरहानपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में व्यापक पैमाने पर केले की खेती की जाती है। कुछ वर्षों पूर्व तक स्थानीय किसान केले के फल निकालने के बाद उसके तनों को निरर्थक (वेस्टेज) मानकर फेंक दिया करते थे।

किंतु, स्व-सहायता समूहों की महिला उद्यमियों ने इस अपशिष्ट को बहुमूल्य संपदा में परिवर्तित कर दिखाया है। महिलाओं ने केले के तनों के रेशों (फाइबर) से विविध प्रकार के हस्तशिल्प और घरेलू उत्पाद बनाने का नया अध्याय शुरू किया। इसके लिए महिलाओं ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) तथा मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के संयुक्त तत्वावधान में विशेष तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया। टोपी, झाड़ू, पेन स्टैंड, चटाई, साड़ी और पूजा सामग्री का निर्माण करने के उपरांत अब इन महिलाओं ने रक्षाबंधन के पावन पर्व हेतु केले के रेशों से शत-प्रतिशत ईको-फ्रेंडली राखियां बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल प्रस्तुत की है।

📦 नाशिक और बुरहानपुर से मिले हजारों राखियों के ऑर्डर्स, 20 महिलाएं दिन-रात निर्माण में जुटीं

शाहपुर स्थित ‘तेजश्री महिला एवं सामाजिक विकास समिति’ की महिला सदस्यों को पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के नाशिक शहर से लगभग 2,500 ईको-फ्रेंडली राखियों का बड़ा व्यावसायिक ऑर्डर प्राप्त हुआ है।

प्राथमिक चरण में इन महिलाओं ने 1,000 निर्मित राखियां सफलतापूर्वक नाशिक भिजवा दी हैं, जबकि 800 अतिरिक्त राखियां तैयार कर ली गई हैं। इसके अलावा, बुरहानपुर के स्थानीय बाजारों से भी समूह को 2,000 राखियों के ऑर्डर मिले हैं। वर्तमान में गांव की लगभग 20 महिलाएं इस निर्माण कार्य में जुटी हुई हैं। थोक बाजार में इन राखियों का विक्रय ₹17 से ₹25 प्रति राखी की दर पर किया जा रहा है, जिससे प्रत्येक महिला को प्रति राखी ₹5 से ₹10 तक का पारिश्रमिक प्राप्त हो रहा है।

🇮🇳 देश की सीमा पर तैनात जवानों, पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम मोहन यादव की कलाई पर बंधेगी बुरहानपुर की राखी

बुरहानपुर के हस्तशिल्प से निर्मित यह ईको-फ्रेंडली राखी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा देश की सीमाओं की रक्षा में तत्पर लगभग 200 भारतीय सैनिकों को भी भेजी जाएगी।

इस राखी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूर्णतः जैव-निम्नीकरणीय (Biodegradable) है; कलाई से उतरने के उपरांत यदि यह प्रकृति में विसर्जित भी होती है, तो पर्यावरण को कोई नुकसान या प्रदूषण नहीं पहुंचेगा। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन जिला कलेक्टर भव्या मित्तल के कार्यकाल में बुरहानपुर के केले को ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के तहत चयनित किया गया था, जिसके बाद से इसके वेस्टेज की मांग में भारी बढ़ोतरी हुई है और किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।

⚙️ ऐसे तैयार होता है केले के तने से प्राकृतिक रेशा, महिलाओं को घर बैठे मिल रहा रोजगार

केले के रेशे से उत्पाद बनाने की प्रक्रिया अत्यंत रोचक और वैज्ञानिक है।

समूह की महिलाएं किसानों से केले के काटे गए तने खरीदती हैं। इसके बाद इन तनों की सलीके से कटिंग की जाती है और एक्सट्रैक्शन मशीन में डालकर महीन प्राकृतिक रेशे निकाले जाते हैं। इन रेशों को स्वच्छ धूप में सुखाने के पश्चात उपयोग योग्य धागा तैयार होता है। इन्हीं धागों से कलात्मक राखियां और अन्य सजावटी सामान निर्मित किए जाते हैं। जो महिलाएं पूर्व में केवल गृहस्थी और घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, वे अब घर के खाली समय का सदुपयोग कर हर महीने सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं।

🤝 साल 2018 में रखी गई थी समिति की नींव, जानिए मास्टर ट्रेनर उषा उदलकर का अनुभव

मास्टर ट्रेनर उषा उदलकर ने अपनी सफलता यात्रा साझा करते हुए बताया कि, “वर्ष 2018 में तेजश्री महिला एवं सामाजिक समिति शाहपुर की स्थापना की गई थी। पिछले 8 वर्षों से हम केले के तनों से फाइबर निकालकर विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार कर रहे हैं। इससे गांव की महिलाओं को घर बैठे रोजगार का साधन मिल गया है।”

उन्होंने बताया कि, “इस बार रक्षाबंधन पर्व को लेकर नाशिक से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली है। 1,000 राखियां भेजी जा चुकी हैं और हमारा लक्ष्य 2,500 से अधिक राखियां तैयार करने का है।” वहीं, समिति से जुड़ी सदस्य मेघा चौधरी ने कहा कि केले के कबाड़ (वेस्टेज) से बनी इन ईको-फ्रेंडली राखियों को देश भर में सराहा जा रहा है, जिससे उनका मनोबल और आय दोनों बढ़े हैं।

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